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08 July 2020

Disclaimer:- किसी भी व्यक्ति, स्थान से समानता मात्र एक संजोग है, अगर इस कहानी से आपकी भावनाओं को ठेस पहुंचती है तो हम उसके लिए क्षमा प्रार्थी है।


Note:- if you are new here, please read the previous part.

Part 1st :- (https://writingthefeeling.blogspot.com/2020/06/innocent-love-part-1-love-story.html)

Part 2nd :-(https://writingthefeeling.blogspot.com/2020/06/innocent-love-part-2-love-story.html)

Previous part:- शिवा लालू को बताता है कि वो जब जतिन से मिलने छत पर गया तब वहाँ पर उसको सिर्फ रूही मिलती है और वो शिवा से पूछती है की शिवा उसको ignore क्यों कर रहा है? लालू ये सुनकर दंग हो जाता है और वो बोलता है की उसे कुछ समझ नही आ रहा।

शिवा:- तू आराम से बैठ क्योंकि कहानी ज़रा लम्बी है।

लालू:- मतलब !

शिवा:- मतलब ये की हम जब छोटे थे तब वो यहाँ अक्सर आया करती थी अपनी मम्मी के साथ और हम लोग साथ में खूब खेला करते थे। फिर उसका अचानक आना बन्द हो गया, मम्मी से पूछा तब पता लगा की रस्तोगी अंकल की अपने दामाद से बनती नही थी इसी वजह से उन्होंने रूही को भी यहाँ भेझना बन्द कर दिया था, पर फिर last year रूही अपनी मम्मी के साथ आयी थी।

लालू:- last year कब आयी थी?

शिवा:- तू जब पिछले साल अपने दादा दादी के यहाँ गया था ना, वो तभी आयी थी।

लालू:- तूने मुझे ये तो कभी बताया ही नहीं।

शिवा:- पहले तुझे कहानी सुननी है या वजह जाननी है?

लालू:- पहले कहानी सुना फिर वजह बताइयो।

शिवा:- तो last year तू अपने दादा दादी के यहाँ जा चुका था और में दिन भर घर में पड़े पड़े bore होता रहता था, पर रोज़ शाम को मैं और जतिन खेला करते थे। ये सब चलते चलते एक हफ्ता बीत गया था। उस दिन भी मैं रोज़ की तरह जतिन के साथ खेलने के लिए रस्तोगी अंकल के यहाँ गया, मैंने उनके दरवाज़े पर दस्तक दी पर पहली बार में दरवाज़ा नही खुला मैंने दुबारा gate खटखटाया और फिर gate खुला, मेरे सामने रूही खड़ी हुई थी। वो मेरे से पूछती है 'आप को किससे काम है' पता नहीं क्यों उस टाइम मैं बिना किसी बात के मुस्कुराने लगता हूँ और उससे बोलता हूँ की 'मुझे जतिन से मिलना है, कहाँ है वो"। वो मेरे को अंदर आने के लिए कहती है। अंदर रस्तोगी अंकल मुझे बुला के रूही और उसकी मम्मी से itnroduce करवाते है, तभी रूही smile के साथ मुझसे पूछती है कि "तुम वही हो जिसके साथ मैं बचपन बहुत खेला करती थी"? सच बोलू तो मुझे बचपन के बारे में कुछ भी याद नही था लेकिन रस्तोगी अंकल बीच में बोल पड़ते है की “हाँ बेटा ये वही लड़का है।” मैं बहुत खुश था पता नहीं क्यों पर खुश था शायद ये सोच कर अब मेरे को जतिन के बहाने रूही के साथ time spend करने को भी मिलेगा। मैंने फिर रस्तोगी अंकल से पूछा की “अंकल जतिन कहाँ है दिख नहीं रहा"। फिर अंकल ने बताया की “वो अपनी नानी के घर जा रहा है इसीलिए तैयार हो रहा है।" और इसीके साथ मेरी खुशियों का plane उड़ने से पहले ही crash हो गया।

लालू:- इसमे कौनसी नई बात थी, ये तो तेरे साथ बचपन से ही होता आ रहा है।

शिवा:- तू पहले बेज्जती करले मेरी ये बात बाद में कभी कर लेंगें। ठीक है?

लालू:- अरे यार बता ना आगे, एक तो जो लड़की मुझे पसन्द आयी उसके साथ तेरा पता नही क्या इतिहास रहा है की वो sorry बोल रही है तुझे, किसी ना किसी तरह से frustration निकलेगी ही ना यार।

शिवा:- चल ठीक है अब आगे सुन, तो जिस दिन रूही आती है ठीक उसी दिन ही जतिन भी अपनी नानी के घर चला जाता है। मैं भी फिर अपने घर वापस आ जाता हूँ और कुछ दिनों तक ऐसे ही घर पर bore होता रहता हूँ। फिर कुछ दिन बाद एक पतंग कट कर आँगन में आकर गिरती है। मैं फिर खुद को थोड़ा अच्छा feel करवाने के लिए छत पर पतंग उड़ाने के लिए चला जाता हूँ। वहाँ पहले से ही काफी सारी पतंग पड़ी हुई थी। मैं सब को एक side में इकठ्ठा करके रख देता हूँ और पतंग उड़ाना शुरू करता हूँ। एक के बाद एक करते हुए मेरी काफी सारी पतंगें कट जाती है। मैं गुस्से में झुंझुला कर छत से चला जाता हूँ। अगले दिन मैं हल्की धूप में ही छत पर चल कर पतंग उड़ाने लगता हूँ और पहली बार में ही सामने वाले की पतंग काट देता हूँ। मेरे पीछे से किसी के हँसने की और तालियां बजाने की आवाज़ आती है, वो रूही थी जो ताली बजा कर मुझे appreciate कर रही थी मैं भी उसे देखकर मुस्कुरा जाता हूँ और मेरी पतंग कट जाती है ये देखकर वो मेरे पर हँसती हुई छत से नीचे चली जाती है। मैं देर शाम तक उसका इंतजार करता रहता हूँ। फिर अगले दिन जब में छत पर आता हूँ तो वो और उसको मम्मी पहले से ही अपनी छत पर मौजूद होते है। मैं अपनी पतंग उड़ाने लगता हूँ और चुपके चुपके उसको देखने की कोशिश भी करता रहता हूँ। इसी बीच हम दोनो का eye contact भी होता है।

लालू बीच में टोंकते हुए कहता है

लालू:- यार तू इतनी detail में क्यों बता रहा है सब कुछ।

शिवा:- मैं ऐसे ही सुनाऊँगा ,,,, और तुझे ऐसे ही सुनना भी पड़ेगा।

लालू:- बोल फिर आगे।

शिवा:- तो वो भी मुझे चुपके से देख रही थी। फिर ऐसा ही तीन और दिनों तक चलता रहा। वो रोज़ मम्मी के साथी ही आती थी और उन्ही के साथ चली जाती थी। मैं भी पतंग उड़ाता था और उसको भी देखता रहता था। फिर उस दिन वो छत पर अकेली ही आयी। मुझे लगा की शायद उसकी मम्मी आने वाली होंगी इसलिए मैं उसकी तरफ कम ही देख रहा था और अपनी पतंग पर पूरा ध्यान लगा रहा था। उस दिन उसकी मम्मी नहीं आयी और वो भी दिन ढलते ही नीचे चली गयी। अगले दिन मैं छत पर तो गया लेकिन आज पतंग उड़ाने का मन नही था इसलिए में बस वहाँ पर जाकर बैठ गया था। थोड़ी देर बाद वो भी छत लर आ जाती है और मेरे को देख कर smile करती है और इशारे से पूछती है की “आज तुम पतंग क्यों नही उड़ा रहे हो।" मैं उसे इशारों में बताता हूँ आज मन नही है इसीलिए बस आकर ऐसे ही बैठ गया था। फिर वो भी वहाँ बैठ जाती है और हम दोनो ही एक दूसरे की आँखों से बच बचाते एक दूसरे को देखने लगते है। ये सब चलते चलते 5 दिन हो जाते है ना ही हम कोई इशारे करते है और नाही कुछ बोलते है, बस एक दूसरे को देखते है और smile pass करते रहते है। फिर कुछ दिनों बाद आता है एक turning point उस दिन सुबह से धूप नही निकली थी, मौसम बहुत सुहाना हो रहा था। ठंडी ठंडी हवाएं चल रही थी और वो अपनी छत की boundary wall पर खड़ी हुई थी। उसके खुले हुए बाल हवा में लहरा रहे थे। मैं अक्सर काफी पीछे की तरफ बैठा करता था पर उस दिन खुद को अपनी boundary wall पर जाने से मैं नही रोक पाया। हमारी छतों के बीच ज़्यादा दूरी नहीं थी, मैं चुपचाप वहाँ जाकर खड़ा हो गया। काफी देर वैसे ही खड़ा रहा और मन में सोचने लगा की जब ये मेरी तरफ देखेगी तो मैं बात शुरू करूँगा। वो एक टक आसमान की तरफ देखे जा रही थी। मुझे ऐसा लगने लगा की वो मुझे ignore कर रही है। मैं फिर भी बहुत हिम्मत करके उससे “hii” बोल देता हूँ, वो फिर भी आसमान की तरफ ही देखती रहती है। मैं सोचता हूँ की इसे मेरे से शायद बात ही नहीं करनी तभी ये मुझे अनसुना कर रही है। तभी अचानक से तेज़ बारिश शुरू हो जाती है। मैं भी मायूस सी शक़्ल लेकर छत से नीचे उतरने लगता हूँ, फिर पीछे से एक आवाज़ आती है, अरे mr. डरपोक इधर आओ। मैं वापस छत पर आता हूँ तो रूही बारिश मैं भीगते हुए मुझे देख कर हँस रही होती है। मैं भी अपने छज्जे पर पहुँचता हूँ और मुस्कुराते हुए उसे देखने लगता हूँ। वो मेरे से बोलती है “कितना डरते हो यार तुम सच में"। मैं इसके जवाब में बोलता हूँ की “मैं कहाँ डरता हूँ"। फिर वो बोलती है की “मेरे से hii बोलने में तुमने इतने दिन लगा दिए और बोल रहे हो की डरते नहीं हो। तुम पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था, मैं आवाज़ नही देने वाली थी पर फिर सोचा की अगर अभी बात नही की तो पता नहीं तुम दुबारा सामने आओगे भी या नहीं।" उसकी ये सारी बाते सुनकर अब मैं उसको एक टक देखते हुए मुस्कुराने लगा। मुझे मुस्कुराता हुआ देखकर वो पूछती है की “क्या हुआ?" मैं बोलता हूँ “मेरे को बारिश कभी अच्छी नहीं लगी पर आज इसमे भीगना बहुत अच्छा लग रहा है। वो थोड़ा से शर्माती है और पूछती है “ऐसा क्यों?" मैं बोलता हूँ “है एक खूबसूरत सी वजह।" वो बोलती है “जब इतनी अच्छी बाते बना लेते हो तो इतना डरते ही क्यों हो?" मैं बोलता हूँ “मैं ज़रा ऐसा ही हूँ।" फिर हम दोनो तक़रीबन 20 minute तक बारिश में खड़े वैसे ही बस एक दूसरे को देखते हुए भीगते रहते है। फिर कुछ देर बाद पूरी तरह अँधेरा हो जाता है और वो bye बोलकर छत से चली जाती है। मैं अगले दिन बात करने के लिए पूरी तरह से तैयारी कर लेता हूँ की क्या बात करनी है रूही से मुझे पर बारिश में भीगने की वजह से मैं उस दिन बहुत बीमार पड़ गया और चाह कर भी छत पर नही जा सका। दो दिन बाद जब मैं ठीक हुआ तो छत पर गया लेकिन जैसे ही रूही ने मुझे देखा वो तुरन्त ही छत से नीचे उतर गयी।

To be continued.......!

Harsh Gaur
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